हर शहर की… 

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हर शहर की अपनी मजबूरी होती है,

हर शहर की अपनी कमज़ोरी।

शहर की मुस्कुराहटों​ को

उसकी अच्छी किस्मत मत समझो,

समझो की शहर में हिम्मत है,

अपने आंसुओ को छुपाने की

क्योंकि

हर शहर की अपनी मजबूरी होती है,

शहर कभी अपनी कह जाता है,

कभी चुप भी रह जाता है।

उसकी चुप्पी के पीछे होती है कोई कहानी।

कहानी मजबूरियों से जूझने की,

कभी सुन कर तो देखो।

पर बिन एक भी आह के।

मिला कर तो देखो कदम शहर से,

शहर रुकेगा नहीं कहीं।

क्योंकि यह भी

हर शहर की अपनी मजबूरी होती है।


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Image used is a water colour painting by famous artist Mr. Milind Mulick

Published by Sneha

Thinker, Poetess, Instructional Designer

12 thoughts on “हर शहर की… 

  1. और ऐसे ही शहर अपनी मजबूरियों को अपनी ताकत बना लेता है, आगे बढ़ जाता है।
    बहुत सुन्दर। हिन्दी को उसके उचित रूप में देखकर अच्छा लगा।

  2. अगर मैं ठीक ठीक व्याख्या कर रहा हूँ तो यह बहुत गहरी रचना है

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